10 अक्टूबर को कॉकरोच जनता पार्टी की तरफ से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग के लिए बुलाए गए प्रोटेस्ट को कवर करने के लिए मैं जैसे-तैसे आईटीओ तक तो पहुंच गई लेकिन इसके आगे का रास्ता आसान नहीं था। मुझ से ज़्यादा मेरा ऑटो वाला परेशान था और बार-बार मुझ से गुज़ारिश कर रहा था कि ”मैडम आप ना ही जाओ तो अच्छा है, वो देखो पुलिस वालों ने एक लड़की को पकड़ा हुआ है” लेकिन मैंने बहुत ही कॉन्फिडेंस के साथ कहा कि ”मैं तो एक पत्रकार हूं हमें डरने की ज़रूरत नहीं है” हालांकि मेरा ये भ्रम कुछ ही देर में चूर-चूर होने वाला था।
मैं ऑटो से उतर कर चंद ही क़दम आगे बढ़ी थी कि देखा, एक बच्ची बेतहाशा रो रही थी और उसे दो महिला पुलिस कर्मी संभाल रही थीं, एक पल को ख़्याल आया कि अपना कैमरा ऑन कर देना चाहिए, लेकिन आभास हुआ, कि ये वो जगह नहीं है, मैं क़रीब पहुंची तो देखा बच्ची बेहद डरी हुई थी और लगातार कह रही थी कि ”पुलिस वालों ने उसे डरा दिया और उसे डिटेन करने की कोशिश की”, वे पसीने में तर-बतर थी, महिला पुलिस और एक बड़ा अधिकारी उसे लगातार समझाने की कोशिश कर रहे थे पर लग रहा था जैसे उसे पैनिक अटैक आया हो (हो सकता है नहीं भी)।
मैंने, उन दो महिला पुलिसकर्मियों के साथ मिलकर बच्ची को शांत करने की बहुत कोशिश की लेकिन वो संभल ही नहीं रही थी, वो कुछ शांत हुई तो मुझे लगा कि पुलिस वाले संभाल लेंगे तो मैं आगे बढ़ने लगी लेकिन तभी पुलिस के एक बड़े अधिकारी ने मुझे बच्ची को संभालने में मदद करने के लिए बुलाया मैं दोबारा मुड़ गई और बच्ची को पुलिस वालों से अलग ले जाकर समझाया और किसी तरह उसे ऑटो में बैठा कर रवाना किया। हर स्टोरी रिकॉर्ड करने के लिए नहीं होती।
ज़ेहन में एक बार के लिए ख़्याल आया कि क्या मुझे उस कार्रवाई को रिकॉर्ड करना चाहिए था ? लेकिन दूसरे ही पल लगा कि नहीं जो किया सही किया शायद मेरी अब तक की पत्रकारिता की समझ ने मुझे यही सिखाया कि हर जगह कैमरा ऑन करने की ज़रूरत नहीं होती, हो सकता है बाज़ दफ़ा बेहतरीन शॉट / विज़ुअल मिस हो जाए लेकिन आप किसी का विश्वास जीत लेते हैं।
बच्ची को छोड़ कर फिर शुरू हुआ जंतर-मंतर तक पहुंचने का सफ़र, मैं लगातार पैदल चल रही थी, रास्ते में प्रोटेस्ट में हिस्सा लेने आए युवा मिलते रहे और हर कोई प्रशासन पर अपनी भड़ास निकाल रहा था। मेरे पैदल चलने का आज इम्तिहान था, मैं लगातार चल रही थी।

जनपथ से जंतर-मंतर की तरफ जाने वाली सड़क पर भारी सुरक्षा के इंतज़ाम
प्रोटेस्ट रोकने के लिए ‘अभूतपूर्व इंतज़ाम’मैं पैदल चल रही थी और बस खाली सड़कों पर चली जा रही थी।
सफ़दर हाशमी मार्ग, टालस्टाय मार्ग बाराखंबा रोड, महाराजा रणजीत सिंह मार्ग, उन तमाम रास्तों को बंद कर दिया गया था जो जंतर-मंतर की तरफ जा रहे। जिसकी वजह से राह खाली और सुनसान थी। 10 अक्टूबर के लिए प्रशासन ने ‘अभूतपूर्व इंतज़ाम’ किए थे। दिल्ली आने-जाने वाली बहुत सी ट्रेनों को रद्द या रीशेड्यूल तो किया ही था साथ ही मेट्रो स्टेशन भी बंद (40 से ज्यादा ) कर दिए गए थे। साथ ही जंतर-मंतर के आस-पास इंटरनेट भी बंद कर दिया गया था और जगह-जगह बैरीकेडिंग की गई थी जिस पर एक सूचना चस्पा थी कि ” इस क्षेत्र में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 लागू है”।
इस नज़ारे में हमें राम मनोहर लोहिया की वो लाइने ज़िन्दा होती दिखीं जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘जब सड़कें सूनी हो जाती हैं, तो संसद आवारा हो जाती है”
वैसे अच्छा ही हुआ कि प्रशासन ने मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए और जंतर-मंतर की तरफ जाने से लोगों को रोक दिया, क्योंकि अगर हम उस दिन पैदल ना चलते तो हमें पता कैसे चलता कि जब जनता की आवाज़ को दबाने की कोशिश होती है तो सड़कें कैसी दिखती हैं।
अगर हम ग्राउंड रिपोर्टिंग नहीं करते तो कैसे उन लोगों की ज़ुबानी जनता तक पहुंचा पाते जो एक चुनौती भरे सफ़र को तय कर दिल्ली तक पहुंचे थे। क्यों मेन स्ट्रीम मीडिया के चर्चित चेहरे ग्राउंड पर नहीं थे?
ऐसा लग रहा था कि जैसे हम किसी वर्चुअल गेम में घुस गए हों, जहां एक बैरीकेडिंग को क्रॉस कर आगे बढ़ना किसी बड़ी जीत के समान हो गया था। तमाम स्वतंत्र पत्रकारों की तरह मुझे भी एक जगह रोक दिया गया और कहा गया कि आगे नहीं जा सकते, मैंने उसने कहा कि मैं एक फ्रीलांस पत्रकार हूं तो उन्होंने छूटते के साथ कहा कि इजाजत नहीं है, मेरे साथ ही एक मेनस्ट्रीम मीडिया का नौजवान भी खड़ा था, उसे भी मना कर दिया गया।
मैं सोच रही थी कि क्या इस प्रोटेस्ट को कवर करने की इजाजत सिर्फ उन चुनिंदा चेहरों को है जिनका प्रोफ़ाइल भी रिपोर्टर नहीं बल्कि स्टूडियो से एंकरिंग करने का है? क्योंकि जो हमें रोक रहे थे वो शायद उन्हें ही आगे बढ़ने की इजाजत देने का मन बना कर बैठे थे जिन्हें उन्होंने प्राइम टाइम पर न्यूज़ चैनलों पर देखा था, लेकिन वो लोग तो सड़क पर उतरने की हिम्मत तक नहीं कर रहे थे, बल्कि लग रहा था कि उनके चैनल की तरफ से अनदेखे चेहरों को ही ग्राउंड पर उतारा जा रहा था। बहरहाल हम तो उस दिन (10 अक्टूबर) किसी ना किसी तरह आगे बढ़ गए लेकिन… ये कैसी गाइडलाइन है ?
प्रशासन क्या कर रहा था ये अगले दिन (11 अक्टूबर) खुल कर सामने आ गया जब पत्रकारों को जमकर निशाना बनाया गया और उन्हें काम करने से रोका गया और डिटेन किया गया। सीजेपी की तरफ से बुलाए गए इस बार के प्रोटेस्ट को कवर करने के दौरान स्वतंत्र पत्रकार सबसे ज़्यादा परेशान किए गए। जहां एक तरफ हम जैसे पत्रकार ग्राउंड रिपोर्ट कवर करने के लिए जूझ रहे थे वहीं। बाद में कोर्ट से आ रही टिप्पणियां क्या कहना चाह रही थीं समझ से परे था।
एक टिप्पणी आई कि ” हमें नहीं पता कि कौन रील बनाने वाला है और कौन स्वतंत्र पत्रकार” हालांकि इससे पहले दिल्ली पुलिस भी पत्रकारों के लिए एक गाइडलाइन जारी कर चुकी थी जिसमें उनकी पहचान (आईकार्ड) से लेकर प्रोटेस्ट को कैसे कवर करना है उसे लेकर दिशा निर्देश दिए गए थे।
इस गाइडलाइन की एक बात बड़ी कमाल की थी कि पत्रकारों को ये भी सुनिश्चित करना होगा कि उनकी मौजूदगी से पुलिस कार्रवाई में कोई बाधा ना आए इसलिए पत्रकारों को सुरक्षित दूरी बनाकर कवरेज और रिकॉर्डिंग करनी होगी और ख़ुद को प्रदर्शनकारियों से अलग रखना होगा।
अब कोई ये बताए कि बग़ैर प्रदर्शनकारियों के क़रीब गए क्या कोई पत्रकार बता पाएगा कि प्रदर्शनकारी क्या चाहते हैं? क्या कोई फोटो जर्नलिस्ट डिटेन किए जा रहे प्रदर्शनकारियों के क़रीब जाए बग़ैर उनकी तस्वीर ले पाएगा?

डिटेन किए गए लोगों से बात करने की कोशिश करते पत्रकार
अगर 10 अक्टूबर को हम जंतर-मंतर के सबसे क़रीब कनॉट प्लेस, जनपथ तक नहीं पहुंच पाते तो कैसे नागपुर से आए युवक से बात कर पाते या जान पाते कि उसके लिए दिल्ली तक आना कितना चुनौती भरा रहा वो कहता है कि ” ये तानाशाही है, सीजेपी के लोगों को डिनेट कर लिया गया है” वे आगे कहते हैं कि ” मैंने दो घंटे पहले ही दिल्ली आने का निर्णय लिया था, दो घंटे बाद मेरी ट्रेन थी और मैं बस जाकर बैठ गया और आ गया। जब हम आ रहे थे (जंतर-मंतर की तरफ) तो हमें रोका गया था, पुलिस हमारे पीछे डंडे लेकर पड़ गई थी, लेकिन हम फिर भी यहां तक आ गए, हमें इस्तीफ़ा चाहिए”
वहीं सिक्किम से पॉलिटिकल एक्टिविस्ट योजना राय अपने साथियों के साथ दिल्ली पहुंची थीं उन्होंने बताया कि पहले उन्होंने ट्रेन का टिकट करवाया था लेकिन बाद में उसे कैंसिल करके हवाई जहाज़ से दिल्ली आईं, जिस वक़्त वे हमें कनॉट प्लेस में सड़क किनारे बैठी मिली थीं उस वक़्त उनके तीन साथियों को डिटेन कर लिया गया था और वो थक कर कुछ देर के लिए आराम कर रही थीं, इस दौरान हमने उनसे बातचीत की।
योजना राय कहती हैं कि ” मैं तो कहूंगी ये तो डेमोक्रेसी को बचाने के लिए प्रोटेस्ट हो रहा है। जिस तरह से चुनाव आयोग ने लापरवाही की है, जिस तरह से वोट चोरी का काम किया है इसकी वजह से पूरे देश में प्रजातंत्र का मज़ाक़ बन गया है। इसलिए जब पूरे देश के युवा इकट्ठा हो कर आ रहे थे तो हमने भी सोचा कि हमें भी हिस्सा लेना चाहिए”
डिटेन करते वक़्त तेज़ सीटी का शोर क्यों?
बहरहाल, इन तमाम बातों के बीच जिन्हें फील्ड तक पहुंचना था वे पहुंचे और अपना काम किया, लेकिन इस दौरान इतना चलने के बाद मैं थक कर चूर हो चुकी थी और समझ नहीं आ रहा था कि कैसे काम करूं? दुकानें भी बंद थी इसलिए पानी तक नसीब नहीं हो पा रहा था। ये हालात थे 10 अक्टूबर को दिल्ली के जंतर-मंतर के आस-पास।
इस दौरान मैंने देखा कि सबसे ज़्यादा जो लोग परेशान हो रहे थे वो स्वतंत्र पत्रकार ही थे। मैं कनॉट प्लेस में पालिका बाज़ार के क़रीब थी और मैंने देखा कि कई किलोमीटर चल कर आ रहे प्रदर्शनकारी को पुलिस देखते ही दौड़ा कर डिटेन कर रही थी, और जैसे ही हम उन लोगों से बात करने की कोशिश करते तो तेज़ सीटियों को बजाया जा रहा था जिसकी वजह से बाइट लेना या फिर उनसे बात करना मुश्किल हो रहा था।
लेकिन मैंने देखा कि यहां एक ऐसी भीड़ भी थी जो बग़ैर आईकार्ड के सिर्फ मोबाइल लेकर रिकॉर्डिंग करते हुए सीजेपी और प्रदर्शन करने आए लोगों को गालियां दे रही थी। ये वही लोग थे जिनके बाद में बहुत से वीडियो वायरल हुए जो स्वतंत्र पत्रकारों और प्रोटेस्ट में हिस्सा लेने आई लड़कियों को निशाना बना रहे थे।
मैं वहीं मौजूद थी लेकिन एक डर सता रहा था कि कहीं कोई घेर ना ले चूंकि मैं अकेली थी तो मैंने वहां से दूर जाना ही बेहतर समझा और मेरा ये फैसला कितना सही था ये घर लौट कर इंटरनेट के चालू होते ही उन तमाम वीडियो ने सही साबित कर दिया जिनमें एक लड़की को प्रदर्शन में शामिल होने पर दौड़ा-दौड़ाकर पीटा जा रहा था।
लेकिन अगले दिन 11 अक्टूबर को तो जैसे पुलिस-प्रशासन ठान कर बैठा था कि पत्रकारों (ख़ासकर स्वतंत्र पत्रकारों) को निशाना बनाना है। और उसके बाद हमने देखा कि कई स्वत्रंत पत्रकारों के साथ कैसा व्यवहार किया गया, आख़िर क्यों? क्या, सच दिखाना इस वक़्त सबसे मुश्किल काम हो गया है? कैसे तय होगा कौन है पत्रकार?
कहा तो ये भी जा रहा था कि ”कौन पत्रकार है” ये कैसे तय किया जाए ? कुछ स्वत्रंत पत्रकारों ने तो ये भी आरोप लगाए कि उनसे डिग्री तक मांगी गई, वैसे डिग्री का खेल भी निराला है, कब किससे और कहां डिग्री मांगनी है ये एक लतीफ़ा बन कर रह गया है। इंस्टाग्राम पर एक मीम देखा था जिसमें बताया गया था कि ”इस देश में जिसका जो काम है वो उसे छोड़कर दूसरे का काम कर रहा है जैसे स्टूडियो में बैठे एंकर कॉमेडी कर रहे हैं और कॉमेडियन पत्रकारिता”
ये एक गंभीर और बहस का मुद्दा है कि वाकई ये कैसे तय होगा कि कौन पत्रकार है? मेरे क़रीब 15 साल के करियर के बावजूद मुझे रोका जा रहा था। क्या कहा जाए और किससे कहा जाए?
क्योंकि फिर प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की तरफ से भी एक गाइडलाइन जारी की गई, और देखा जाए तो उसमें भी उन्हीं तमाम बातों को दोहराया गया था जिन्हें पहले ही दिल्ली पुलिस कह चुकी थी। तो अब ऐसे में स्वतंत्र पत्रकार क्या करे? अगर उसके पास नौकरी नहीं है तो क्या स्वतंत्र रूप से पत्रकारिता नहीं कर सकता? क्या वो जनता तक वो सूचना ना पहुंचाए जो घट रहीं हैं?
मेरे जैसे पत्रकार जिन्होंने 10 अक्टूबर को क़रीब 9-10 किलोमीटर (जंतर-मंतर तक आने और जाने को मिलाकर) चल कर अपने पैसे ख़र्च करके लोगों तक सूचना पहुंचाने का काम (जी हां कोई उपकार नहीं बल्कि अपना काम) किया तो क्या ग़लत किया?
(नजमा ख़ान की रिपोर्ट)